एक ही तो चैप्टर है काम का
आप कितने अच्छे हैं। हर बार आपके लिए आना पड़ता है। सुना है ज्यादा समझदार हो गए हो। एक-तरफा ही सेंचुरी मार लोगे हैना। मैं खुद भी नहीं जानता कि किस हद तक मैंने अपने आपको यहां तक ला दिया है। कई बार तो लगता है कि मैं ही हूं यहाँ अकेला, कोई साथ नहीं है। जिससे उम्मीद थी साथ होने की, वो पता नहीं कहाँ है। शायद भीड़ में रह गया है कहीं। गलती मेरी ही होगी, मैंने कस्स के हाथ नहीं पकड़ा या हो सकता कि जरूरत से ज्यादा पकड़ लिया हो और वो बुरा मान गया हो। कभी-कभी लगता है कि गलत कर लिया मैंने। इतना कस्स के नहीं पकड़ना चाहिए था कि पता चले उसका हाथ ही मेरा सहारा है और जब वो छूटे तो धड़ाम से गिरना पड़े। पर बता भी तो सकता था वो। अब 'मजा' आ रहा होगा खूब हैना। इतना ज्यादा कि जब तक अंदर जो है वो बाहर नहीं उलट देता तब तक ये 'मजा' आता ही रहेगा। भविष्य तो अब देखा नहीं जा सकता। पर भगवान को एक हेल्पलाइन तो देनी चाहिए-सामने वाले के अंदर को समझ सके इतनी तो कम से कम। या फिर माता-पिता को परवरिश के टाइम प्रेम-प्यार का चैप्टर भी शामिल करना चाहिए। ताकि 'हाथ पकड़ने' से पहले संभल तो जाएँ...