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तुम मुझे अजनबी मानों और मैं तुम्हें

जो कभी पूरी हो नहीं सकती वो ख्वाईस की है मैंने... कि तुम फिर से मेरी जिंदगी में आओ.. उसी अजनबी की तरह.. कि मैं तुम्हें अजनबी मानुं और तुम मुझे फिर से वही एक दूसरे से बात करने के बहाने ढूंढे, तुम मुझसे नोट्स मांगो और मैं तुमसे तुम मेरे नंबर पूछो और मैं तेरे तुम मुझसे पहले टीचर का काम करो और मैं तुमसे तू मुझसे जले और मैं तुझसे तू मुझे देख के असाइनमेंट बना और मैं तुझे तू मुझसे अनजान रहे और मैं तुझसे तू मुझसे अपना प्यार छुपा और मैं तुझसे तू अपनी आजादी में मगन रहे और मैं अपनी तू भी अपने सपने देखे और मैं भी ना मैं किसी से तेरी बात सुनुं और ना तू मेरी तू मुझे मेरे नाम से बोले और मैं तुझे तेरे से तू मुझे अपने मन की बात ना बताना और ना मैं तुझे अपने मन की फिर वो अचानक मेरे अंदर का ज्वाला (तेरे से बात करने का) कभी ना फूटे, तेरे अंदर का भी तेरे अंदर ही रहे अजनबी थे तो अजनबी ही रहें आगे भी बस तेरे अन्दर की तेरे में रहे और मेरे अंदर की मेरे में जो कभी पूरी हो नहीं सकती वो ख्वाइश की है मैंने कि तुम फिर से मेरी जिंदगी में आओ... उसी अजनबी की तरह.. कि तुम म...

एक ही तो चैप्टर है काम का

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आप कितने अच्छे हैं। हर बार आपके लिए आना पड़ता है। सुना है ज्यादा समझदार हो गए हो। एक-तरफा ही सेंचुरी मार लोगे हैना। मैं खुद भी नहीं जानता कि किस हद तक मैंने अपने आपको यहां तक ला दिया है। कई बार तो लगता है कि मैं ही हूं यहाँ अकेला, कोई साथ नहीं है। जिससे उम्मीद थी साथ होने की, वो पता नहीं कहाँ है। शायद भीड़ में रह गया है कहीं। गलती मेरी ही होगी, मैंने कस्स के हाथ नहीं पकड़ा या हो सकता कि जरूरत से ज्यादा पकड़ लिया हो और वो बुरा मान गया हो। कभी-कभी लगता है कि गलत कर लिया मैंने। इतना कस्स के नहीं पकड़ना चाहिए था कि पता चले उसका हाथ ही मेरा सहारा है और जब वो छूटे तो धड़ाम से गिरना पड़े। पर बता भी तो सकता था वो।  अब 'मजा' आ रहा होगा खूब हैना। इतना ज्यादा कि जब तक अंदर जो है वो बाहर नहीं उलट देता तब तक ये 'मजा' आता ही रहेगा।  भविष्य तो अब देखा नहीं जा सकता। पर भगवान को एक हेल्पलाइन तो देनी चाहिए-सामने वाले के अंदर को समझ सके इतनी तो कम से कम। या फिर माता-पिता को परवरिश के टाइम प्रेम-प्यार का चैप्टर भी शामिल करना चाहिए। ताकि 'हाथ पकड़ने' से पहले संभल तो जाएँ...

एक बात कहनी थी, आप सुनोगे...

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बड़े दिनों से एक शिकायत थी खुद से कि जो अंदर है वो सारा बाहर उलट दूँ। अब पता नहीं आप उससे कितना RELATE कर पाएंगे। पर इतना जरूर है कि यहाँ से खाली हाथ नहीं जाओगे।  आपने भी कभी न कभी किसी खाश चीज़ से जुड़ाव, लगाव या जो आप ठीक समझो वो महसूस किया होगा और जब सब-कुछ आपकी इच्छा या सोच के अनुकूल न हो तो दुःख भी हुआ होगा, होता होगा। आखिर क्या जरूरत है हमें किसी से इतनी ज्यादा उम्मीदें रखने की, अपेक्षाएं रखने की। जबकि हर कोई अपने विचारों, इरादों और सोच के लिए स्वतंत्र है।  आपकी हर बात को मानने वाला, समझने वाला 'पागल' भी नहीं होता और फिर एक तरफा इतना ज्यादा लगाव रखने वाला 'समझदार' भी तो नहीं होता।  एक तरफा लगाव या जुड़ाव में हम कभी-कभी इतनी ज्यादा अपेक्षाएं और उम्मीदें पाल बैठते हैं कि जब वो टूटती हैं तो आप भी टूटने लगते हो। ऐसे में ना गलती आपकी होती है और सामने वाले की तो क्या होगी। बस देर होने से पहले खुद को संभाल जरूर लें। वरना 'टूटना' किसी के लिए आधी मौत से कम नहीं होता।   जब लगाव दोनों-तरफा हो तब की बात और है। मगर एक-तरफा में ...