एक बात कहनी थी, आप सुनोगे...
बड़े दिनों से एक शिकायत थी खुद से कि जो अंदर है वो सारा बाहर उलट दूँ। अब पता नहीं आप उससे कितना RELATE कर पाएंगे। पर इतना जरूर है कि यहाँ से खाली हाथ नहीं जाओगे। आपने भी कभी न कभी किसी खाश चीज़ से जुड़ाव, लगाव या जो आप ठीक समझो वो महसूस किया होगा और जब सब-कुछ आपकी इच्छा या सोच के अनुकूल न हो तो दुःख भी हुआ होगा, होता होगा। आखिर क्या जरूरत है हमें किसी से इतनी ज्यादा उम्मीदें रखने की, अपेक्षाएं रखने की। जबकि हर कोई अपने विचारों, इरादों और सोच के लिए स्वतंत्र है। आपकी हर बात को मानने वाला, समझने वाला 'पागल' भी नहीं होता और फिर एक तरफा इतना ज्यादा लगाव रखने वाला 'समझदार' भी तो नहीं होता। एक तरफा लगाव या जुड़ाव में हम कभी-कभी इतनी ज्यादा अपेक्षाएं और उम्मीदें पाल बैठते हैं कि जब वो टूटती हैं तो आप भी टूटने लगते हो। ऐसे में ना गलती आपकी होती है और सामने वाले की तो क्या होगी। बस देर होने से पहले खुद को संभाल जरूर लें। वरना 'टूटना' किसी के लिए आधी मौत से कम नहीं होता। जब लगाव दोनों-तरफा हो तब की बात और है। मगर एक-तरफा में ...